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एक दिवाली ऐसी भी

बाहर देखो कितना सुन्दर है सब
रंग, रौशनी और ख़ुशी में सरोबार हें सब।
पर क्यूँ आज याद है मुझे
वो माँ के घर का प्यार
सारे घर में सिर्फ एक ही आवाज़
“दिशा, रंगोली बन गई?”
“दिशा, पूजा सजा ली?”।
घर मानो हो जाता था चिड़िया घर
सबलोग सब कुछ बोल रहे लेकिन आवाज़ ना पड़ती कानो पर।
रसोई से पकवानो की खुशबु,
गुजिया, नमकीन,गुलाबजामुन बस रह ना जाए कुछ।
सारे घर का रोशन होना
कहीं बिजली तो कहीं फूलों का कोना।
फिर आती शाम की बारी
देखो ,माँ रंगोली कितनी सुन्दर उतारी
कितने खीले हुए हैं सब
हंसी,ठिठोली क्यूँ ना करें अब।
पठाके जो बज़े,  सुतली , लड़ी , अनार भी पीछे ना रहे
ये देखो राकेट उड़ा,
कहीं तुम्हारी कमीज़ में तोह नहीं घुसा??
आज फिर वही दिवाली है,
लेकिन क्यूँ मन भारी है?
जो अपने थे ,कभी पास थे वोह पता नहीं चले गए कहाँ,
माँ के हाथ की गुजिया खो गई कहाँ।
माँ तो में भी हूँ ,
पर मेरी माँ की गोद में सर रखती हूँ।
इतना क्यूँ याद आता है सब,
वोह खुशबु,वो रंग,वो हर एक पल।
बस … एक दिवाली ऐसी भी।।।